क्या है ट्रांसजेंडर और कलरब्लाइंडनेस का अनोखा कनेक्शन?

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क्या है ट्रांसजेंडर और कलरब्लाइंडनेस का अनोखा कनेक्शन?

क्या है ट्रांसजेंडर और कलरब्लाइंडनेस का अनोखा कनेक्शन?

रंगों से भरी इस दुनिया में हम सब अपनी पहचान और अपनी पसंद के रंगों को चुनते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी की जेंडर पहचान (Gender Identity) और उसकी आँखों से दिखने वाले रंग आपस में उलझ जाएँ, तो ज़िंदगी कैसी होगी?

चिकित्सा विज्ञान और सामाजिक बदलाव के इस दौर में आज हम बात करेंगे एक ऐसे विषय पर, जो सीधे तौर पर हमारे समाज के एक हिस्से, उनके डीएनए (DNA) और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा है।

आखिर 'ट्रांसजेंडर' कौन होते हैं?

बहुत ही आसान शब्दों में कहें तो, जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो डॉक्टर उसके शरीर को देखकर कहते हैं कि यह 'लड़का' है या 'लड़की'। इसे 'जन्म के समय निर्धारित लिंग' (Assigned Sex at Birth) कहा जाता है।जैसे-जैसे वह बच्चा बड़ा होता है, अगर उसकी अपनी अंदरूनी भावना और पहचान (Gender Identity) उसी लिंग से मेल खाती है, तो उसे सिसजेंडर (Cisgender) कहते हैं। लेकिन, जब किसी व्यक्ति की अंदरूनी पहचान उसके जन्म के समय मिले लिंग से अलग होती है—यानी शरीर लड़के का है लेकिन वह खुद को अंदर से पूरी तरह एक महिला महसूस करती हैं, या शरीर लड़की का है और वह खुद को पुरुष महसूस करते हैं—तो उन्हें ट्रांसजेंडर (Transgender) कहा जाता है। यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एक स्वाभाविक मानवीय विविधता है।

क्या ट्रांसमीडियम या ट्रांसजेंडर लोगों को कलरब्लाइंडनेस हो सकती है? हाँ, बिल्कुल हो सकती है। लेकिन इसका संबंध उनके ट्रांस होने से नहीं, बल्कि उनके माता-पिता से मिले क्रोमोसोम (DNA) से है।चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, सबसे आम 'रेड-ग्रीन कलरब्लाइंडनेस' (लाल और हरे रंग को न पहचान पाना) X क्रोमोसोम के कारण होती है।ट्रांस वुमन (जन्म के समय पुरुष): इनके पास XY क्रोमोसोम होते हैं। सिर्फ एक X क्रोमोसोम होने के कारण इनमें कलरब्लाइंडनेस का खतरा बहुत ज़्यादा होता है।

आँकड़े बताते हैं कि हर 12 में से 1 ट्रांस महिला (8%) कलरब्लाइंड होती है। ट्रांस मैन (जन्म के समय महिला): इनके पास XX क्रोमोसोम होते हैं। इन्हें कलरब्लाइंड होने के लिए दोनों X क्रोमोसोम में खराबी होनी चाहिए, जो कि बहुत दुर्लभ है। इसलिए केवल 200 में से 1 ट्रांस पुरुष (0.5%) ही इससे प्रभावित होते हैं।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ता है?
एक आम इंसान के लिए कलरब्लाइंडनेस सिर्फ कुछ रंगों का न दिखना है, लेकिन एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए, खासकर एक ट्रांस महिला के लिए, यह रोज़ की ज़िंदगी को बहुत कठिन बना देता है। मेकअप और ग्रूमिंग (Styling): जब एक ट्रांस महिला समाज में अपनी फेमिनिन (महिला) पहचान को अपनाती है, तो शुरुआत में मेकअप, सही शेड की लिपस्टिक चुनना, स्किन टोन से मैच करता हुआ फाउंडेशन लगाना या कपड़ों के कलर्स मैच करना उनके लिए एक बड़ा टास्क होता है।

कलरब्लाइंडनेस के कारण लाल, गुलाबी या हरे रंग का अंतर मिट जाता है, जिससे परफेक्ट लुक पाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है!

मेडिकल और हॉर्मोन थेरेपी: ट्रांस लोग अक्सर हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) लेते हैं। हॉर्मोन्स बदलने से आँखों के सूखेपन (Dry Eyes) या अंदरूनी प्रेशर पर असर पड़ सकता है, जो कलरब्लाइंडनेस की चुनौती को और बढ़ा देता है।

ट्रांस प्राइड फ्लैग साल 1999 में मोनिका हेल्म्स द्वारा डिज़ाइन किए गए ओरिजिनल ट्रांस प्राइड फ्लैग में पांच पट्टियां थीं—लाइट ब्लू (हल्का नीला), लाइट पिंक (हल्का गुलाबी) और बीच में व्हाइट (सफेद)। इस फ्लैग में समस्या क्या थी? रेड-ग्रीन कलरब्लाइंड लोगों को 'लाइट पिंक' रंग में मौजूद लाल हिस्सा दिखाई ही नहीं देता। उनके लिए वह गुलाबी पट्टी या तो ग्रे (धूसर) दिखती है या बिल्कुल फीकी नीली। नतीजा यह होता है कि वे फ्लैग के रंगों में अंतर नहीं कर पाते।

अब इस फ्लैग में क्या बदलाव आया और इसका मकसद क्या है? कम्युनिटी के भीतर हर किसी को शामिल करने (Inclusivity) के मकसद से अब 'कलरब्लाइंड-फ्रेंडली ट्रांस फ्लैग' का इस्तेमाल बढ़ा है। इस नए फ्लैग में रंगों के पैलेट को थोड़ा बदला गया है। पिंक की जगह एक खास मैजेंटा या गहरे टोन का इस्तेमाल किया गया है और रंगों के कंट्रास्ट (गाढ़ेपन और चमक) को इतना बढ़ा दिया गया है कि कलरब्लाइंड व्यक्ति भी बिना किसी भ्रम के साफ देख सके कि कौन सा रंग कहाँ है। इस फ्लैग का सीधा मकसद यह संदेश देना है कि 'प्राइड' की इस लड़ाई में कोई भी पीछे न छूटे, चाहे उसकी आँखों की रोशनी का दायरा कुछ भी हो।

उम्मीद की नई किरण: डॉ. सुमित्रा का 25 वर्षों का अनुभवइस पूरी चुनौती के बीच एक राहत भरी और बेहद सकारात्मक खबर भी है। डॉ. सुमित्रा, जो पिछले 25 वर्षों से लगातार कलरब्लाइंडनेस के क्षेत्र में शोध और काम कर रही हैं, का मानना है कि इस समस्या का एक बेहतरीन तकनीकी समाधान मौजूद है।डॉ. सुमित्रा के अनुसार, आज के एडवांस मेडिकल साइंस में ऐसे विशेष कस्टमाइज्ड लेंसेस बनाए जा सकते हैं, जो आँखों में जाने वाली रोशनी के वेवलेंथ (Wavelength) को फ़िल्टर करते हैं।

ये लेंसेस उन रंगों के बीच के अंतर को उभार देते हैं जिन्हें कलरब्लाइंड लोग सामान्यत नहीं देख पाते। यदि इन आधुनिक लेंसेस की मदद ली जाए, तो कलरब्लाइंड ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की ज़िंदगी में एक बड़ा बदलाव आ सकता है। वे न केवल अपने प्राइड फ्लैग के खूबसूरत रंगों को सही तरीके से देख पाएंगे, बल्कि उनकी रोज़मर्रा की स्टाइलिंग, मेकअप और पहचान से जुड़ी राह भी बेहद आसान और खूबसूरत हो जाएगी।

डॉ सुमित्रा अग्रवाल आर्टिफीसियल ऑय को कोलकाता,  यूट्यूब आर्टिफीसियल ऑय को कॉल 8820606896

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